प्रभुर बचन तखन शुनिया
प्रभु के वचन सुनकर श्रीवास भूमि पर लोट गए और बोले, "हे नाथ! सुनिए, मैं आपके रस-भंग को सहन नहीं कर सकता।"
"हे नाथ! मेरा एक पुत्र मर गया, इसमें मुझे क्या दुःख है? यदि सब पुत्र मर जाएँ, तो भी आपके दर्शन से मुझे सुख ही मिलेगा।
हे हरि! आपके नृत्य में विघ्न पड़ना मेरे लिए मृत्यु से भी बढ़कर है। इसी अनिष्ट के भय से मैंने आपको यह दुःखद समाचार नहीं दिया।
"अब आज्ञा दें, हम मृत पुत्र को लेकर उसका अन्तिम संस्कार करें।" यह सुनकर ब्राह्मणों के शिरोमणि चैतन्य महाप्रभु रो पड़े।
"इन सबको छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ? ऐसा हुआ तो मेरे प्राण व्याकुल हो उठेंगे।" यह बात सुनकर भक्तिविनोद के मन में भय समा गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- भाव
- पद
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