Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

शान्तिपुरेर बऋआ माली बैकुण्ठ बागान खालि

शान्तिपुरेर बऋआ-माली बैकुण्ठ बागान खालि करिया आनिल एक चारा निता-इ मालीरे पाञा चारा तार हाते दिया यतने रोपित कैल नाडा
अर्थ

शान्तिपुर के महान माली वैकुण्ठ से एक नन्हा पौधा ले आए और उसे निताई को दे दिया। निताई ने माली के हाथ से वह पौधा ले लिया। नाड़ा ने उसे यत्नपूर्वक रोप दिया।

नदीया उत्तम स्थान ताहाते करि उद्यान रोपिल चैतन्य-तरु माली बाडे तरु दिने दिने शाखा-पत्र अगणने गजा-इल यत्ने जल ढालि
अर्थ

नदिया के सबसे गौरवशाली स्थान में उन्होंने एक उद्यान बनाया। वहाँ माली ने चैतन्य-वृक्ष रोपा। वृक्ष दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। उसकी शाखाएँ और पत्ते अनगिनत हो गए। माली ने यत्न से उसे जल से सींचा और वह खूब बढ़ा।

पा-इया भकति-जल नाम-प्रेम दु-इ फल प्रसबिल से तरु सुन्दर से-इ दु-इ फलेर आशे जीब-पखी नित्य आसे कोलाहले करे निरन्तर
अर्थ

भक्ति (भक्तिमय सेवा) के जल से सींचे जाने पर उस सुन्दर वृक्ष में दो प्रकार के फल लगे: नाम (पवित्र नाम) और प्रेम (भावमय दिव्य प्रेम)। जीवात्मा रूपी पक्षी उन दोनों फलों को चखने के लिए तरसते हुए सदा वहाँ आते हैं। वहाँ हमेशा कोलाहल मचा रहता है।

आनन्दे निता-इ माली ल-इय माथाय डालि दु-इ फले सबारे बिलाय ना-इ जाति भेदाभेद सबार मिटिल खेद फलास्वदे सकलेते पाय
अर्थ

माली निताई ने आनन्द से ये दोनों प्रकार के फल तोड़े, उन्हें डलिया में रखा और वह डलिया अपने सिर पर उठा ली। जाति या जन्म का भेद किए बिना उन्होंने वे फल सबको बाँटे। जिसने भी इन फलों को चखा, उसके सारे दुःख और कष्ट समाप्त हो गए।

धर ल-ओ ल-ओ बलि आनन्दे निता-इ माली आ-चण्डाले फल बिला-इल ये-इ चाय से-इ पाय ये न चाहे से-ओ पाय यबने-ओ फल आस्वादिल
अर्थ

“कृपया लो। लो। लो।” कहते हुए माली निताई ने आनन्द से सबको, यहाँ तक कि चाण्डालों तक को, वे फल बाँटे। जिसने भी उन फलों की इच्छा की, उसे वे तुरन्त मिल गए। जिन्होंने इच्छा नहीं की, उन्हें भी वे फल मिल गए। यवनों ने भी उन फलों का स्वाद लिया।

कि मोर करम फेरे न हेरिनु से तरु रे न चिनिनु से माली दयाल कृष्ण दास दुराशय दन्ते तृण करि कय धिक् धिक् ए पोडा कपाल
अर्थ

अपने पिछले कर्मों के फेर से मैंने उस वृक्ष को नहीं देखा। मैंने उस दयालु माली को नहीं पहचाना। दाँतों में तिनका दबाकर मैं, दुष्ट हृदय कृष्ण दास, कहता हूँ: हाय! हाय! मेरे सिर पर जलती हुई विपत्ति टूट पड़ी है!

इस भजन के बारे में

रचयिता
कृष्ण दास
पद
6