शचीर आङ्गिनाय नाचे
शची माता के आँगन में बालक विश्वम्भर राय खेलते हैं। मुस्कुराते और खिलखिलाते हुए वे एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और अपनी माता से छिपते फिरते हैं।
अपने वस्त्र से स्वयं को ढककर वे कहते हैं, “मैं छिप गया!” शची माता विश्वम्भर से कहती हैं, “मुझे तो तुम दिखाई नहीं दे रहे!”
अपनी माता की साड़ी का आँचल पकड़े हुए वे डगमगाते पैरों से नाचते फिरते हैं, खंजन पक्षी की चंचल चाल की तरह।
वासुदेव घोष कहते हैं, “कैसी अनोखी शोभा है! निमाई का शिशु-रूप देखकर सारा जगत् मोहित हो जाता है।”
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बेलोयार राग, दशकोशी
- पद
- 4
- रिकॉर्डिंग
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।