आरे मोर आरे मोर गोरा द्विज मणि
अरे, मेरे गौर, मेरे गौर, द्विजों के राजा! “राधा! राधा!” पुकारते हुए वे रोए। वे धरती पर लोटे।
भगवान गौर ने बड़ी लगन से राधा का नाम जपा। उनकी लाल आँखों से आँसुओं की कितनी स्वर्गीय गंगाएँ बह चलीं?
उनके शरीर के रोम खड़े हो गए। वे रुँधे हुए स्वर में बोले। वासुदेव घोष पूछते हैं: भगवान गौर इतने व्याकुल क्यों हैं?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- जयजयन्ती राग
- पद
- 4