- पद 5भजनजय गौर बलि दु-इ बाहु तुलि
करे रोल यात्रि-गण
दुंहार प्रभाबे करि अनुभब
यदुर बिस्मित मन - पद 4अर्थपीछे जाकर श्री गौर राय अपना सिर रथ से लगाकर उसे धकेलते हैं। रथ तुरन्त हवा की गति से चल पड़ता है। पल भर में ऐसा लगता है मानो वह आठ सौ मील चला गया हो।
- पद 5अर्थरथयात्रा के भक्तजन दोनों बाहें उठाकर पुकारते हैं, "जय गौर!" श्री जगन्नाथ और श्री गौर दोनों की दिव्य शक्ति को अपनी आँखों से देखकर यह यदु दास आश्चर्य से चकित हो जाता है।
“गौर आरती” के परिणाम
439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में
इनमें से कोई भी शब्द वाले भजन, सारे शब्दों वाले पहले। केवल सारे शब्दों वाले भजन
1 पद भजन में
2 पद अर्थ में
1 पद भजन में
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- पद 3भजनचलन सुन्दर मत्त करि-बर
नूपुर झङ्कृत बलिया
भाबे अबश नाहि दिग-पाश
गौर बलि हुहुङ्कारिया - पद 2अर्थगौरवशाली निताई उमंग में नाचते हैं। उनके नेत्र लाल हैं। उनका मुख चन्द्रमा जैसा है। उनमें कितनी माधुरी भरी है?
- पद 3अर्थमत्त गजराज के समान वे सुन्दर चाल से चलते हैं, उनकी पायल छन-छन बजती है। भाव-विभोर होकर उन्हें दिशाओं का भान नहीं रहता, वे 'गौर, गौर' पुकारकर गरज उठते हैं।
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- पद 2भजनझलकत सु-ललित अबिरल पुलक पान्ति
सघने गरजत गौर-प्रेम-रसे माति - पद 1अर्थगौरवशाली अद्वैत आचार्य आनन्द के धाम और गुणों के राजा हैं। उनका दिव्य रूप सुवर्ण-पर्वत के अभिमान को भी हर लेता है।
- पद 2अर्थप्रेम की उमंग में उनके भव्य और सुन्दर शरीर के रोम पुलकित हो उठते हैं। भगवान गौर के प्रेम का अमृत पाकर वे आनन्द से उन्मत्त होकर ऊँचे स्वर में गरजते हैं।
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- पद 2भजनअबिरत गौर प्रेम-रसे माति
झलमल अबिरल पुलक पान्ति - पद 1अर्थसीता के पति अद्वैत प्रभु की जय जय हो! वे मेरे स्वामी हैं। उनका गौरवशाली रूप सुवर्ण-पर्वत को भी परास्त कर देता है।
- पद 2अर्थभगवान गौर के प्रेम का अमृत पाकर वे निरन्तर आनन्द से उन्मत्त रहते हैं। उनके तेजोमय और भव्य शरीर के रोम सदा पुलकित रहते हैं।
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- पद 4भजनसघने गौर-हरि बोलये उच्च करि
झरये सुधा जानि मुख-चान्दे
करुणा चाहनिते के पारे थिर हैते
पतित नरहरि हेरि कान्दे - पद 1अर्थअद्वैत आचार्य गुणों के रत्न हैं। शुद्ध भक्ति के महान धन को मुक्त हाथों से बाँटकर उन्होंने सारे संसार को धनवान बना दिया है। भगवान गौर की महिमा का कीर्तन करते भक्तों से घिरे हुए वे प्रेमानन्द में डूबकर नाचते हैं।
- पद 4अर्थ'गौर-हरि!' वे ऊँचे स्वर से पुकारते हैं। उनके चन्द्र-सम मुख से अमृत बहता है। उनकी करुणा-दृष्टि पाकर कौन-सा पतित पापी शान्त रह सकता है? अद्वैत आचार्य को निहारकर पतित नरहरि दास रो पड़ते हैं।
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- पद 2भजन(भज) गौर-गदाधराद्वैत गुरु-नित्यानन्द
(गौर-कृष्णे अभेद जेने' रे)
(गुरु-कृष्ण-प्रेष्ठ जेने' रे)
(स्मर) श्रीनिबास हरिदास मुरारि मुकुन्द …
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- पद 2भजनत्रि-भुवन-कमनं तमाल-वर्णं
रवि-कर-गौर-वराम्बरं दधाने
वपुर् अलक-कुलावृताननाब्जं
विजय-सखे रतिर् अस्तु मे 'नवद्या
1 पद भजन में
3
- पद 1भजननमो भक्तिविनोदाय सच्-चिद्-आनन्द-नामिने
गौर-शक्ति-स्वरूपाय रूपानुग-वराय ते
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- पद 1भजनगौराविर्भाव-भूमेस् त्वं निर्देष्टा सज्-जन-प्रियः
वैष्णव-सार्वभौमः ष्री-जगन्नाथाय ते नमः
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- पद 4भजनस्वछ्हन्दे बैस हे वत्स श्री-गौराङ्ग-धामे
जुगल-भजन ह-उ, रति ह-उ नामे
मम भक्त-कृपा-बले विघ्न जाबे दूर
शुद्ध चित्ते भज राधा-कृष्ण रस-पूर - पद 4अर्थवे कहेंगे, "हे वत्स! यहाँ श्री गौरांग-धाम में निश्चिन्त होकर बैठो और सुख से रहो। तुम युगल का भली भाँति भजन करो, और उनके नाम में तुम्हारा अनुराग जागे। मेरे भक्तों की कृपा के बल से सब बाधाएँ दूर हो जाएँगी। शुद्ध चित्त से राधा-कृष्ण का भजन करो, क्योंकि यह भजन…
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