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“गौर आरती” के परिणाम

439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में

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2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    शुन-इते गौराङ्ग खेद
    मझु बुक नहे काहे भेद
  • पद 8भजन
    गौरक शुनि इह भाष
    भण राधामोहन दास
  • पद 1अर्थ
    जब मैं श्री गौरांग की व्यथा सुनता हूँ, तो मेरा हृदय टुकड़ों में क्यों नहीं बिखर जाता?
  • पद 8अर्थ
    श्री गौर के इन वचनों को सुनकर राधामोहन इस गीत में उन्हें फिर से कहते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    ये जन गौराङ्ग भजिते चाय
    से शरण ल-उक निता-इ-चान्देर
    अरुण दु-खानि पाय
  • पद 4भजन
    ये निता-इ बलिया कान्दे
    ज्ञान दास कहे गौर-पद से-इ
    हियार माझरे बान्धे
  • पद 1अर्थ
    जो कोई गौरांग की भक्ति करना चाहता है, उसे पहले निताईचन्द्र के अरुण चरणों की शरण लेनी चाहिए।
  • पद 4अर्थ
    ज्ञानदास कहते हैं कि जो कोई 'निताई' पुकारकर रोता है, वह गौर के चरणों को सदा अपने हृदय में बांधे रखता है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्गचान्द हेर नयनेर कोणे
    शरण ल-इनु तोमार शीतल चरणे
  • पद 7भजन
    गौराङ्ग निता-इ मोरे ना कर नैराश
    दन्ते तृण धरि कहे नरहरि दास
  • पद 1अर्थ
    हे गौरांगचन्द्र, अपनी आँखों के कोने से मेरी ओर देखिए। मैं आपके शीतल चरणों की शरण लेता हूँ।
  • पद 7अर्थ
    हे गौरांग! हे निताई! मेरी आशा को मत तोड़िए! दाँतों में तिनका दबाकर नरहरि दास ये वचन कहते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग-प्रेम-बादले डोबे सब प्रेम-जले
    नदी नाला खाल बिल सकलि
    आमार कपाल भाङ्गा मरुमय शुकनो डाङ्गा
    मोर हिया ना डुबे एकलि
  • पद 2भजन
    हरि हरि हे गौराङ्ग केन ए अधमे बाम
    काङ्गाले करुणा कर बारेक नयने हेर
    दे-ओ महा-मन्त्र हरि-नाम
  • पद 1अर्थ
    गौरांग प्रभु के प्रेम की वर्षा से नदी, नाले, नहरें, ताल-तलैया, सब प्रेम-जल से भर गए हैं। अब सब कोई उस प्रेम-जल में डूबे हुए हैं। हाय! मैं पागल हूँ। मेरा मस्तक रोगी और टूटा हुआ है। इसीलिए मैं इस सूखे टीले पर अकेला रह गया हूँ। इसीलिए केवल मेरा हृदय उस प्रेम-जल…
  • पद 2अर्थ
    हरि! हरि! हे गौरांग! मैं इतना पतित क्यों हो गया? हे प्रभु, इस भिखारी पर कृपा करें। एक बार अपनी कृपा-दृष्टि उस पर डालें। उसे हरि-नाम का महामंत्र प्रदान करें।
3 पद भजन में

गोविन्द दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    अद्वैत आचार्य गौराङ्ग-शिरे
    ढारत जाह्नबी-बारि धीरे धीरे
  • पद 3भजन
    पट्ट-बसन ले-इ श्रीबास पण्डित
    गौर-कलेबरे करल बेष्टित
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  • पद 5भजन
    गौरी-दास शिरे धरल छत्र
    नरहरि ब्यजने ब्यजये गात्र
3 पद भजन में

नरहरि दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग के जाने महिमा तोमार
    कलि-युग उद्धारिते पतित-पाबन अबातर
  • पद 2भजन
    श्याम-महोदधि केमने बिधाता
    मथिया से कर-ताल
    कत सुधा-रस ताहे निरम्निया
    उपजिल गौराङ्ग रसाल
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  • पद 3भजन
    त्रि-भुबने प्रेम बादर ह-इल
    गौर-प्रेम-बरिषणे
    दीन हीन जन ओ रस मगन
    नरहरि गुण गाने
3 पद भजन में

नरहरि दास · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग नहिते तबे कि ह-इते
    केमने धरिते दे
    राधार महिमा प्रेम-रस-सीमा
    जगते जाना-इते के
  • पद 3भजन
    गा-ओ पुनः पुनः गौराङ्गेर गुण
    सरल ह-इय मन
    ए भब-सागरे एमन दयाल
    न देखि ये एक-जन
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  • पद 4भजन
    गौराङ्ग बलिया न गेनु गलिया
    केमने धरिनु दे
    नरहरि हिया पाषाण दिया
    केमन गडियाछे
3 पद भजन में

वासुदेव घोष · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नदीया आकाशे आसि उदिल गौराङ्ग-शशी
    भासिल सकले कुतूहले
    लाजेते गगन-शशी माखिल बदने मसी
    काल पेये ग्रहणेर छले
  • पद 4भजन
    ग्रहणेर अन्धकारे केह ना चिह्नेर करे
    देब नरे हइल मिशामिशि
    नदीया नगरी सङ्गे देब-नारी आसि रङ्गे
    हेरिछे गौराङ्ग रूप -राशि
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  • पद 5भजन
    पुत्रेर बदन देखि जगन्नाथ महा-सुखी करे दान दरिद्र सकले
    भुबन आनन्द-मय गौर-बिधु समुदय
    बसु कहे जीब-भाग्य-फले
3 पद भजन में

वृन्दावन दास ठाकुर · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    गौर गोविन्द-गँअ शुन हे रसिक-जन
    बिष्ँउ महा-बिष्ँउ पर पहुं
    याँर पद-नख-द्युति परम ब्रह्मेर स्थिति
    सुर-मुनि प्राँएर गँअ तुहुं
  • पद 2भजन
    अन्तरे बरँअ भिन्न बाहिरे गौराङ्ग चिह्न
    श्री-राधार अङ्ग-कान्ति राजे
    शत-दल-कमल हेम-कर्ँइकार माझे
    बिहर-इ चारि द्वारि साजे
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  • पद 5भजन
    सहस्र सहस्र काँए लोलिया लोलिया पडे मुखे
    सृजि दु-इ जिह्वाय गौरचन्द्र गुँअ गाय
    पद-पद्मे महा-लक्ष्मी बुके
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि

  • पद 1भजन
    गौराङ्ग ठेकिल पके
    भाबेर आबेशे राधा राधा बलि डाके
  • पद 1अर्थ
    गौरांग मण्डल बनाकर नाचते हैं। भाव के आवेश में वे 'राधा! राधा!' पुकारते हैं।
  • पद 2अर्थ
    गंगा को देखकर गौर कहते हैं कि यह यमुना है। खिले हुए फूलों का वन देखकर उनके हृदय में वृन्दावन का स्मरण हो आता है।
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  • पद 3अर्थ
    प्रेम के भाव में डूबे गौर एक त्रिभंगी रूप का दर्शन करते हैं, जो पीले वस्त्र पहने है और मुरली लिये है।
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    बलि-कलि-मत्त-मतङ्गज-मरदन, गौर-सिंह नाचत नदीयाय
    जय जय रब सब भुबन बियापित, निखिल लोक मिलि चौधिके धाय
  • पद 1अर्थ
    कलियुग के बलवान उन्मत्त गजराज को कुचलते हुए नदिया के सिंह भगवान गौर नृत्य करते हैं। जय! जय! की ध्वनि से सब लोक भर जाते हैं। चारों दिशाओं से सभी उनकी ओर दौड़ते हैं।
  • पद 2अर्थ
    भगवान् गौर अपने प्रिय सहचरों के साथ गाते हैं। ऐसी तालों की तरंगें बहती हैं, जिन्हें किन्नर भी नहीं बजा सकते। मुरज और मृदंग बोल उठते हैं, 'दृमिकि दृमि दांदा द्रिमिकट धिकट धिलंग!'
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  • पद 3अर्थ
    भगवान् गौर के चरण-कमलों के स्पर्श से धरती काँप उठती है। भगवान् गौर का शरीर अनुपम ढंग से झूमता है। वे प्रेम में विभोर हैं। उनके शोभामय लाल नेत्रों को देखकर कितने कामदेव चकित रह जाते हैं!
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नाचत नट-बर गौर-किशोर
    अभिनब भङ्गी भुबन करु भोर
  • पद 1अर्थ
    नर्तकों में श्रेष्ठ गौर-किशोर नृत्य करते हैं। उनकी नवीन और सुन्दर भाव-भंगिमाएँ सभी लोकों को आनन्द से उन्मत्त कर देती हैं।
  • पद 4अर्थ
    चकोर पक्षी जैसे भक्त अपनी आँखों से गौर प्रभु रूपी चमकते चन्द्रमा की अमृत भरी चाँदनी पीते हैं।
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  • पद 5अर्थ
    गौर प्रभु मधुर स्वर में हरि के पवित्र नामों का गान करते हैं। उन्हें सुनकर कौन निरन्तर रोए बिना रह सकता है?
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    आजु बिरह-भाबे गौराङ्गसुन्दर
    भूमे पडि कान्दे बोले कांहा प्राणेश्वर
  • पद 1अर्थ
    विरह के भाव से अभिभूत होकर श्री गौरांगसुन्दर भूमि पर गिर पड़ते हैं। रोते हुए वे कहते हैं, "मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं?"
  • पद 3अर्थ
    जब भक्त ऊँचे स्वर में श्री हरि का नाम गाते हैं, तो श्री गौर सुनकर होश में आ जाते हैं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4अर्थ
    यह देखकर सब लोग रो पड़ते हैं। यह राधामोहन दास अपना सब कुछ श्री गौर को समर्पित करता है।
3 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    अशेष गुणेर निधि गौराङ्ग-सुन्दर
    आनन्दे बिभोर सदा नदीया-नागर
  • पद 5भजन
    लिप्त श्री-गौराङ्ग-तनु श्री-हरिचन्दने
    लीलाबती नारी हेरि हय अचेतने
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 8भजन
    चतुर्दश स्वराबली ये करे कीर्तन
    अचिरे लभये से-इ गौराङ्ग-चरण
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नमो गौर-किशोराय साक्षाद्-वैराग्य-मूर्तये
    विप्रलम्भ-रसाम्भोदे पादाम्बुजाय ते नमः
  • पद 1अर्थ
    मैं गौरकिशोर दास बाबाजी महाराज को प्रणाम करता हूँ, जो वैराग्य के साक्षात् स्वरूप हैं। हे कृष्ण-विरह के रस के सागर! मैं आपके चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ।
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नाचत गौर पूरब रसे भोर
    कनक धराधर गरब बिभञ्जन
    झलकत अङ्ग अतनु चित-चोर
  • पद 1अर्थ
    कृष्णरूप में अपनी पूर्व लीलाओं के रस का आस्वादन करते हुए भगवान गौर नृत्य करते हैं। उनके चमकते अंग, जो सुमेरु पर्वत के गर्व को चूर करते हैं, कामदेव के मन को मोहित कर लेते हैं।
  • पद 4अर्थ
    उनके प्रिय सहचर सुंदरता से खोल और करताल बजाते हुए गाते हैं। उनका गर्जनशील संगीत आकाश को भेद देता है। अब समस्त लोक प्रेमोन्माद में डूब गए हैं। नरहरि कहते हैं, अब भगवान गौर की उज्ज्वल निर्मल महिमा सब लोकों को भर देती है।