श्री गङ्गा-नारायणाष्टकम्
कुल-परम्परा में बँधे कर्मकाण्डियों का उद्धार करने की इच्छा से स्वयं गंगा जी ने कृपा करके उनमें प्रवेश किया। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
भक्ति के साक्षात् अवतार श्री नरोत्तम ने आनन्दपूर्वक अपनी भक्ति उनमें स्थापित की। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
वृन्दावन में उनका यश प्रसिद्ध है और आज भी सन्तों की सभाओं में गाया जाता है। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
श्री गोविन्ददेव के द्विभुज रूप का प्रतिपादन करने वाली श्रुति सुनाकर उन्होंने सन्तों पर आई विपदा दूर कर दी। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
वे सुशील स्वभाव वाले हैं, गुण-रूपी रत्नों के भण्डार हैं, पाण्डित्य के सार हैं और प्रतिभा के सूर्य हैं। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
जो लोग उनकी शरण में आए, उन्हें उन्होंने केवल अपनी कृपा-दृष्टि से तुरन्त अपने चरणों में स्थान दे दिया। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
स्वयं श्री गौरहरि ने उन्हें जगत में प्रभुत्व और स्थिर भक्तियोग प्रदान किया। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
उनके बिना वृन्दावन की अत्यन्त गोपनीय भक्ति का ज्ञान कहीं से भी प्राप्त नहीं हो सकता। प्रेमरस के सागर वे श्री चक्रवर्ती गंगानारायण मुझ पर दया करें।
जो प्रेम के सागर श्री गंगानारायण के चरणों में दृढ़ विश्वास रखकर एकाग्र मन से इस अष्टक का पाठ करता है, वह उनके परिकर में स्थान पाता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- स्तवामृत-लहरी
- भाव
- पद
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