श्री मुकुन्दाष्टकम्
उनका सुन्दर श्रीअंग इन्द्रनील मणि की कान्ति को भी मात देता है। उस पर गान्धर्विका के प्रेम-विलास से लगा केसर का कुंकुम, उनके देह-रूपी राज्य में राज करने वाले राजा मदन की शोभा को और बढ़ा देता है। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
उनका मुख उदित हुए असंख्य चन्द्रमाओं की ज्योति को भी पीछे छोड़ देता है। नयी तरुणाई के रंग में रंगे बचपन के अन्तिम चिह्नों से वे अत्यन्त मनोहर लगते हैं। सखियों की सभा में अपने झूलते कुण्डलों से वे ललिता और उनकी सखियों के हृदय को डोला देते हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
अपने नितम्बों पर वे ऐसा पीताम्बर पहनते हैं जो सोने के ढेर की शोभा को भी लजा दे, और उसके ऊपर नया लाल वस्त्र। इस प्रकार मानो वे अपनी प्रियतमा का प्रिय वर्ण ही धारण किए हुए हैं, जो सुनहरा है और राग की, अर्थात् प्रेम की, लाली से रंगा है। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
ग्रीष्म ऋतु की एक सन्ध्या को, अपने प्रिय सरोवर राधा-कुण्ड में, जिसका जल अनेक सुगन्धित फूलों से महक रहा है, वे सखियों से घिरी राधा के साथ जल-क्रीड़ा करते हैं और प्रेम जगाने वाले छींटों से उन्हें भिगोते हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
अहा! यहाँ गान्धर्विका की सुगन्ध पाते ही उनका शरीर पुलकित हो उठता है और वे उसी क्षण प्रेम में उन्मत्त हो जाते हैं। फिर वे वन के उन सभी स्थानों को सूँघते फिरते हैं जो उसी सुगन्ध से महक रहे हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
वे अपनी सुदृढ़ भुजा कीर्तिदा की सुन्दर कुमारी के कन्धे पर रखते हैं और मुस्कान से खिले उनके कपोल पर चुम्बन देकर प्रेम के आनन्द का विस्तार करते हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
अहंकारी असुरों के दल के लिए वे प्रलय की अनोखी अग्नि हैं। व्रज-भूमि में वे अपने माता-पिता के स्नेह का साकार रूप हैं। और राधिका के लिए वे श्यामल वर्ण वाले, प्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ रस माधुर्य के महाराज हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
प्रेम की पीड़ा से व्याकुल राधा का मान तोड़ने के लिए वे अपने दुःख की कथा सुनाकर कोमल-हृदया विशाखा को अपने पक्ष में कर लेते हैं, और मनुहार भरी मीठी बातों से प्रखर स्वभाव वाली ललिता से विनती करते हैं। वे मुकुन्द मेरे नेत्रों की अभिलाषा पूर्ण करें।
जो व्यक्ति इन्द्रियों को सब विषयों के संग से रोककर, दीन भाव से विनती करते हुए मुकुन्द के इस अष्टक का पाठ करता है, उसे व्रज के नवयुवराज राधा सहित अपना दर्शन देते हैं और उसे अपनी प्रियतमा के निजजनों में गिन लेते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- रूप गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- भाव
- पद
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