नंदग्राम धाम
वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi
श्री वृन्दावन धाम प्रणाम
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अक्षर
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गाते समय
जयति जयति वृन्दारण्यम् एतन् मुरारेः
प्रिय-तमम् अति-साधु-स्वान्त-वैकुण्ठ-वासात्
रमयति स सदा गाः पालयन् यत्र गोपीः
स्वरित-मधुर-वेणुर् वर्धयन् प्रेम रासे
अर्थ
मुरारी के अत्यन्त प्रिय इस वृन्दावन की जय हो, जय हो! यह उन्हें महान् सन्तों के हृदय में और वैकुण्ठ में रहने से भी अधिक प्यारा है। यहाँ वे सदा गायें चराते हुए, बाँसुरी पर मधुर स्वर छेड़कर गोपियों को आनन्द देते हैं और रास में उनका प्रेम बढ़ाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- सनातन गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- प्रणाम मन्त्र
- भाव
- पद
- 1