चैतन्य-चरितामृत में अनुपम मल्लिक के आन्तरिक जीवन के बारे में जो कुछ भी दर्ज है, वह लगभग सब एक ही बातचीत से मिलता है। आश्चर्य की बात यह है कि इसे श्री चैतन्य महाप्रभु नहीं, बल्कि सनातन गोस्वामी सुनाते हैं। वे अपने सबसे छोटे भाई के तिरोभाव के बाद उन्हें याद कर रहे थे। जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु ने अभी-अभी सनातन को बताया था कि अनुपम का बंगाल में तिरोभाव हो गया है। साथ ही महाप्रभु ने अनुपम की स्मृति में अपनी ओर से कुछ शब्द कहे: "तुम्हारे भाई अनुपम का अब तिरोभाव हो गया है। वे एक बहुत अच्छे भक्त थे जिनकी रघुनाथ (भगवान रामचन्द्र) में दृढ़ श्रद्धा थी" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.27)। सनातन ने विनम्रता और शोक के साथ इसका उत्तर दिया। उनका यही उत्तर हमें सबसे पूरा चित्र देता है कि अनुपम वास्तव में कैसे व्यक्ति थे।
सनातन ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बताया कि अनुपम "अपने बचपन के आरम्भ से ही... अत्यन्त दृढ़ता के साथ" भगवान रामचन्द्र की उपासना करते रहे। वे रामचन्द्र के पवित्र नाम का जप करते थे और निरन्तर रामायण सुनते थे (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.30-31)। बड़े भाई सनातन और रूप गोस्वामी हर समय अनुपम के साथ रहते थे। वे चाहते थे कि उनका सबसे छोटा भाई भी उनकी तरह कृष्ण में लीन हो जाए। इसलिए वे बार-बार उनसे कृष्ण के सौन्दर्य और लीलाओं की बातें करते थे: "हम दोनों के साथ कृष्ण की भक्ति में लग जाओ। हम तीनों भाई साथ रहेंगे और भगवान कृष्ण की लीलाओं की चर्चा का आनन्द लेंगे" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.35)। अन्त में अनुपम ने बाहर से उनकी बात मान ली। उनके हृदय में सचमुच कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। भाइयों के प्रति प्रेम और सम्मान के कारण ही वे झुक गए थे। उन्होंने कहा: "मेरे प्रिय भाइयो, मैं तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन कैसे करूँ? मुझे कृष्ण-मन्त्र में दीक्षा दो, ताकि मैं भगवान कृष्ण की भक्ति कर सकूँ" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.37)।
उन्होंने यह बात मन से नहीं कही थी, और कहते ही उन्हें स्वयं यह पता चल गया। उस रात उन्हें नींद नहीं आई। चैतन्य-चरितामृत बताता है कि वे आँसू बहाते हुए जागते रहे और बार-बार एक ही प्रश्न पर सोचते रहे: "मैं भगवान रघुनाथ के चरण-कमल कैसे त्याग दूँ?" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.38)। सुबह तक उन्हें अपना सच्चा उत्तर मिल गया, और वे उसे सीधे अपने भाइयों के पास ले गए। "मैंने अपना सिर भगवान रामचन्द्र के चरण-कमलों पर बेच दिया है," उन्होंने उनसे कहा। "मैं उसे वापस नहीं ले सकता। यह मेरे लिए अत्यन्त पीड़ादायक होगा" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.40)। इसके बजाय उन्होंने भाइयों से आशीर्वाद माँगा कि वे जन्म-जन्मान्तर रघुनाथ के चरणों की सेवा कर सकें। उन्होंने कहा कि उन चरणों को छोड़ने का विचार मात्र भी उनका हृदय तोड़ देता है (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.41-42)।
रूप और सनातन ने उन पर और दबाव नहीं डाला। चैतन्य-चरितामृत बताता है कि इसके बजाय उन्होंने अनुपम को गले लगा लिया। जिस गुण को बदलने में उन्होंने इतना समय लगाया था, उसी की उन्होंने प्रशंसा की: "तुम एक महान साधु भक्त हो, क्योंकि भक्ति में तुम्हारा दृढ़ निश्चय अटल है" (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.43)। जब सनातन ने जगन्नाथ पुरी में यह पूरा प्रसंग सुना दिया, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसकी तुलना केवल एक दूसरे उदाहरण से की, जिसे वे इसके बराबर मानते थे। यह उदाहरण मुरारि गुप्त का था। वे भी भगवान रामचन्द्र के दृढ़ भक्त थे। महाप्रभु ने स्वयं मुरारि गुप्त की इस आसक्ति की परीक्षा ली थी और उसे भी उतना ही अडिग पाया था (चैतन्य-चरितामृत, अन्त्य 4.45)।
इस प्रसंग को एक छोटा-सा पारिवारिक मतभेद समझना आसान है, जो शान्ति से सुलझ गया। लेकिन गौड़ीय वैष्णव परम्परा ने इसे कभी इस तरह नहीं देखा। यह प्रसंग दिखाता है कि जिस परिवार ने आगे चलकर सम्प्रदाय को उसके छह गोस्वामियों में से तीन दिए, उसके भीतर भी भक्ति का अर्थ यह नहीं था कि सब एक ही प्रकार की उपासना करें। अनुपम मल्लिक अपने पूरे वयस्क जीवन में कृष्ण-भक्तों के बीच रहे। परम्परा के दो महानतम आचार्यों ने स्वयं उनकी परीक्षा ली, फिर भी वे कभी विचलित नहीं हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना निर्णय कुछ श्लोक पहले, इस वृत्तान्त के आरम्भ में ही सुना दिया था। वह बाद में दी गई कोई सान्त्वना मात्र नहीं था। स्वयं भगवान की दृष्टि में सबसे मुख्य बात यही थी: वे एक बहुत अच्छे भक्त थे।
