Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

कलि कबलित कलुष जडित

कलि कबलित कलुष जडित देखिया जीबेर दुख करल उदय ह-इय सदय छाडिया गोकुल-सुख
अर्थ

कलियुग के द्वारा निगल लिए गए और अपने ही पापों से जड़ बने हुए पतित जीवों का दुःख देखकर भगवान कृष्ण को उन पर दया आई। गोकुल का आनन्द पीछे छोड़कर वे इस संसार में आए।

टेक
देख गौर गुणेर नाहि सीमा दीन-हीन पा-आ बिलाय याचि-आ बिरिञ्चि-बाञ्छित प्रेम
अर्थ

भगवान गौर को देखो! उनके गुणों का कोई अन्त नहीं। वे दीन-हीन पतित जीवों के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि वे दिव्य प्रेम का यह दान स्वीकार करें, वह प्रेम जिसे पाने की लालसा देवता ब्रह्मा भी करते हैं।

जाति न बिचारे आ-चण्डाले तारे करुणा-सागर गोरा भाब भरे सदा अङ्ग टलमल गमने भुबन भोरा
अर्थ

भगवान गौर जाति का विचार नहीं करते। वे वह प्रेम सबको देते हैं, चाण्डालों तक को। भगवान गौर करुणा के सागर हैं। दिव्य प्रेम से भरे होने के कारण चलते समय उनका शरीर काँपता है। उनके चरणों की चाल से पृथ्वी आनन्द से भर जाती है।

क्षणे क्षणे कत करुणा करये गरजे गभीर नादे अधम देखिया आकुल ह-इया धरिया धरिया कान्दे
अर्थ

पल-पल उनके हृदय में करुणा उमड़ती है। वे गहरी आवाज़ में गर्जना करते हैं। पतित जीवों को देखकर वे व्याकुल हो उठते हैं। उन्हें बार-बार गले लगाकर वे रोते हैं।

चरण कमल अति सु-कोमल राता उत्पल रीत बदन कमले गद गद स्वरे गा-ओये रसमय गीत
अर्थ

उनके अति कोमल चरण लाल कमल के फूलों जैसे हैं। उनका मुख कमल के फूल जैसा है। रुँधे गले से निकले उनके शब्द सबसे मधुर गीत हैं।

हाहाकार करि भुज-युग तुलि बले हरि हरि बोल राधा राधा बलि कान्दे उच्च करि रहि गदाधर कोल
अर्थ

बाहें उठाकर वे गर्जना करते हैं, “हरि! हरिबोल!” “राधा! राधा!” पुकारते हुए वे गदाधर को गले लगाकर रोते हैं।

मुरली मुरली क्षणे क्षणे बलि स्वरूप मुख नेहारे गोबिन्द दासिया से भाब देखिया ताहा कि कहिते पारे
अर्थ

पल-पल “बाँसुरी! बाँसुरी!” पुकारते हुए वे स्वरूप दामोदर के मुख को निहारते हैं। गोविन्द दास यह सारा भाव बस देखता रहता है। उसमें इसका वर्णन करने की क्या सामर्थ्य है?

इस भजन के बारे में

पद
7