कलि कबलित कलुष जडित
कलियुग के द्वारा निगल लिए गए और अपने ही पापों से जड़ बने हुए पतित जीवों का दुःख देखकर भगवान कृष्ण को उन पर दया आई। गोकुल का आनन्द पीछे छोड़कर वे इस संसार में आए।
भगवान गौर को देखो! उनके गुणों का कोई अन्त नहीं। वे दीन-हीन पतित जीवों के पास जाकर उनसे विनती करते हैं कि वे दिव्य प्रेम का यह दान स्वीकार करें, वह प्रेम जिसे पाने की लालसा देवता ब्रह्मा भी करते हैं।
भगवान गौर जाति का विचार नहीं करते। वे वह प्रेम सबको देते हैं, चाण्डालों तक को। भगवान गौर करुणा के सागर हैं। दिव्य प्रेम से भरे होने के कारण चलते समय उनका शरीर काँपता है। उनके चरणों की चाल से पृथ्वी आनन्द से भर जाती है।
पल-पल उनके हृदय में करुणा उमड़ती है। वे गहरी आवाज़ में गर्जना करते हैं। पतित जीवों को देखकर वे व्याकुल हो उठते हैं। उन्हें बार-बार गले लगाकर वे रोते हैं।
उनके अति कोमल चरण लाल कमल के फूलों जैसे हैं। उनका मुख कमल के फूल जैसा है। रुँधे गले से निकले उनके शब्द सबसे मधुर गीत हैं।
बाहें उठाकर वे गर्जना करते हैं, “हरि! हरिबोल!” “राधा! राधा!” पुकारते हुए वे गदाधर को गले लगाकर रोते हैं।
पल-पल “बाँसुरी! बाँसुरी!” पुकारते हुए वे स्वरूप दामोदर के मुख को निहारते हैं। गोविन्द दास यह सारा भाव बस देखता रहता है। उसमें इसका वर्णन करने की क्या सामर्थ्य है?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 7