बहु जन्म भाग्य बशे चिन्मोय मधुर रसे
अनेक जन्मों के संचित सौभाग्य से किसी जीव के हृदय में उस चिन्मय मधुर रस के लिए लालसा जागती है। जब यह लालसा तीव्र हो जाती है, तब वह जीव व्रज-धाम में प्रवेश करता है और श्रील रूप गोस्वामी के अनुयायियों की भक्ति में तन्मय हो जाता है।
श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति के सर्वोत्तम मार्ग की शिक्षा दी। जो इस भक्ति को समझे बिना ही कृष्ण-भजन करने का प्रयास करता है, वह अपना जीवन केवल तुच्छ और निरर्थक कार्यों में बिता देता है।
इस भक्ति को समझाने के लिए ही इस दीन जन ने यह "भजन-दर्पण" लिखा है। जो व्रज में राधा-कृष्ण की सेवा के लिए उत्सुक हो, वह इस ग्रन्थ को सहर्ष सुने।
यदि यह लालसा मेरे भीतर जन्म ले ले, तो मैं शीघ्र ही आगे बढ़ूँगा। तब श्रद्धा, रति और प्रेम क्रमशः प्रकट होंगे। जब भजन के लिए सहज अनुराग जागेगा, तब साधन-भक्ति के विधि-विधान फिर दिखाई नहीं देंगे। वे विधियाँ तो केवल आरम्भिक साधकों के लिए हैं।
माँ के हृदय में पुत्र के लिए प्रेम सहज ही स्थिर रहता है, परन्तु दूषित हृदय को वह प्रेम सीखना पड़ता है। इसी तरह नित्य-सिद्ध जीव में अद्भुत कृष्ण-प्रेम स्वभाव से ही रहता है, परन्तु हे भाइयों, बद्ध जीव में वह प्रेम प्रकट नहीं होता।
यदि जीव भक्ति के विधि-विधान का पालन करे, तो उसे प्रभु के प्रति अद्भुत अनुराग प्राप्त होता है। जब हृदय में वह अनुराग जागता है, तब जीव का सांसारिक बन्धन टूट जाता है, और तब वह जीव व्रज के आनन्द में नाचने लगता है।