बन्धु गण शुनोह बचन मोर
हे मित्रो! मेरी बात सुनो। जब मैं प्रेम-भाव में विभोर रहता हूँ, तब मेरे हृदय का वह चोर मुझे अपने दर्शन देता है।
जब मैं ध्यानपूर्वक उन्हें देखना चाहता हूँ, तब वे मेरी आँखों से ओझल हो जाते हैं। फिर उन्हें न देख पाने से मेरे प्राण रो उठते हैं; इस दुःख का कोई पार नहीं रहता।
क्या सारे जगत के वे मित्र कभी मुझे भी अपने साथ ले लेंगे? वे मेरे साथ जो चाहें करें, फिर भी वे ही सदा मेरे प्राणनाथ हैं।
दर्शन का आनन्द देकर वे मेरे प्राणों को सुख देते हैं और प्रेम के वचन बोलते हैं। फिर पुनः अदृश्य होकर वे मेरे हृदय को जला देते हैं; इस प्रकार मेरे प्राणधन मुझे मार डालते हैं।
जिसमें उनका सुख है, वही सुख मेरा भी सुख है। मेरे लिए अपना सुख और दुःख सदा एक समान हैं।
मिलन में हो या वियोग में, भक्तिविनोद जानते हैं कि श्रीकृष्ण ही उनके प्राणों के स्वामी हैं। श्रीकृष्ण के सुख में ही वे सुखी हैं। श्रीकृष्ण ही उनके प्राणनाथ हैं, वे कभी पराए नहीं हो सकते।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतावली
- भाव
- पद
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