बेश बना इया सहचरे
वेश और आभूषण पूरी तरह सज जाने पर मित्रों ने भगवान् गौर के हाथ में सोने का दर्पण रखा। भगवान् गौर चन्द्रमा के समान शोभायमान थे।
भगवान् निमाईचन्द्र को इतने सुन्दर वेश और शृंगार में देखकर उनके सिवा किसी और को कौन देख सकता था? कोई भी उनसे अपनी आँखें नहीं हटा सका।
अपनी सखियों के साथ माता शची ने न जाने कितने मंगल-कर्म किए? वे अपने पुत्र का मुख निहारती रहीं।
युवतियाँ दूर ही खड़ी रहीं। किसी तरह भगवान् गौरचन्द्र का मुख निहारते हुए वे अपनी उमंग को रोक न सकीं।
स्त्रियों ने “उलु-लुलु!” की ध्वनि की। भगवान् गौर के आनन्दमय विवाह के वर्णनों से सारा संसार भर गया।
भगवान् गौर राय ने माता के चरणों में प्रणाम किया। फिर उन्होंने अपने विवाह-संस्कार के लिए यात्रा आरम्भ की।
ब्राह्मणों ने वेदों का उच्चारण किया। अनेक प्रकार के वाद्य बजाए गए। उस कोलाहल भरी ध्वनि ने आकाश को दो भागों में चीर दिया।
उस उत्सव के आनन्द का वर्णन करने की शक्ति किसमें है? नरहरि सुख के उस महासागर में तैर रहा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 8