आहा मरि मरि गौराङ्गचान्देर चरिते केब न झुरे
हाय! हाय! हाय! बालक गौरांगचन्द्र की लीलाओं के कारण कौन नहीं रोता? रात में बालक गौरचन्द्र को न देख पाने के कारण नदिया के लोग अपने प्राण धारण नहीं कर पाते।
सोने के लिए बिछौने पर लेटकर वे बालक गौरांगचन्द्र के सिवा और कुछ नहीं सोच पाते। उनके हृदय बालक गौरांगचन्द्र के चिन्तन में लीन रहते हैं। भोर होते ही वे उठकर “गौर! गौर!” कहते हैं। बालक गौर के प्रेम-रस में वे विभोर हैं।
स्त्री और पुरुष बालक गौर का वर्णन करने के लिए कोई उपमा नहीं सोच पाते। उन्होंने कितनी बार यत्न किया? किसी को भी ऐसी कोई वस्तु नहीं सूझी जो बालक गौर की सुन्दर महिमा के समान हो।
अपने साथियों को पास लेकर नदिया के सब वयस्क लोग उस बालक की पूजा करते हैं जो नरहरि के स्वामी हैं। वे बालक गौर से प्रेम भरे मधुर वचन बोलते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4