आजु कि आनन्द श्री शची भुबने रजनी प्रभात काले
भोर के समय शची के घर में आनन्द भरा है। अपने साथियों के बीच बालक विश्वम्भर मनोहर ढंग से खेल रहे हैं।
वे सबको सुख देते हैं। सब उन्हीं के चिन्तन में लीन हैं। वे गुणों के रत्न के समान हैं। वे सब लोकों को मोह लेते हैं। उनके जैसा कोई और किसी ने नहीं देखा।
वयस्क स्त्री-पुरुष सब उनके प्रेम से भरे हैं। उनके चन्द्रमा जैसे मुख को बार-बार देखकर कोई भी शान्त नहीं रह पाता।
उनकी आँखों से निरन्तर आँसू बहते रहते हैं। उनके हृदय आनन्द से भरे हैं। वे बार-बार एक-दूसरे से बालक गौरांग की लीलाएँ कहते हैं, वही गौरांग जो नरहरि के प्राण हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4