अधिबास निशि पोहा इले
इस तरह अधिवास की रात धीरे-धीरे बीत गई। अब सब लोग विवाह की व्यवस्था में लगे हैं।
ब्राह्मणों के समूह से घिरे हुए भगवान् निमाई वेद-विहित कर्म करते हैं।
लोगों की बड़ी-बड़ी भीड़ भगवान् निमाई की महिमा के प्रेमभरे शब्द कहती है। बहुत बड़ा कोलाहल हो रहा है।
तरह-तरह के वाद्य निरन्तर बजते रहते हैं। गायक आदि से अन्त तक गाते हैं।
भाट कवि कविताएँ सुनाते हैं। स्त्रियाँ मधुर उपहार देती हैं।
संस्कारों के समय सब लोग उल्लास में हैं। नरहरि आनन्द में तैर रहा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6