आजि आङ्गिन पर नदीया बालक साञे
शची के नन्हे पुत्र आज आँगन में नदिया के बालकों के साथ आनन्द से खेल रहे हैं। उनके हाथों और पैरों के नाखून मानो एक ही राजसी चन्द्रमा हैं, जो सब दिशाओं को प्रकाश से भर रहा है।
सब बालक इकट्ठे होकर तरह-तरह के खेल खेलते हैं, तरह-तरह के खेल खेलते हैं। हर मुख पर हँसी खिल उठी है। बालक गौर और दूसरे बालक ऐसे लगते हैं मानो एक कमल का फूल बहुत से कमल के फूलों के साथ खेल रहा हो।
बालकों का खेल देखकर शची का हृदय आनन्द से भर जाता है। नन्हे विश्वम्भर को गोद में बिठाकर वे उनके मुख को सौ-सौ बार चूमती हैं।
वे अपने वस्त्र के छोर से उनके पसीने की बूँदें पोंछती हैं और उनके सुन्दर अंगों पर पंखा झलती हैं। पास में खड़ा पापी नरहरि दास हाथ में चामर लेकर उसे डुला रहा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4