आजु कत ना आनन्द मने
आज भगवान् विश्वम्भर को सिंहासन पर बिठाकर उनके मित्र उन्हें सुन्दर वस्त्रों और आभूषणों से सजाते हैं। उन मित्रों के हृदयों में न जाने कितने आनन्द भरे हैं?
वे उनके अंगों पर सुगन्ध और चन्दन का लेप करते हैं। उनके सुन्दर माथे पर तिलक लगाते हैं। उनमें से कौन अभिभूत नहीं हो जाता?
वे उनके सुन्दर घुँघराले केश बाँधते हैं। प्रसन्न हृदय से वे उन पर मधुर मालती की माला डालते हैं।
वे उनके कानों में कुण्डल पहनाते हैं। वे कुण्डल उन गालों पर चमकते हैं, जो चमकते दर्पणों का भी गर्व हर लेते हैं।
वे उनके गले में रत्नों का हार पहनाते हैं। वह हार उनके वक्ष पर सुन्दर ढंग से इधर-उधर झूलता है। उपमाओं और रूपकों से उसका वर्णन कौन कर सकता है?
वे उनकी कलाइयों और भुजाओं पर कंगन और बाजूबन्द पहनाते हैं। कोई उनकी उँगलियों में अँगूठियाँ पहनाता है। वे शान्ति से उनका मुख निहारते हैं।
वे उनकी पतली कमर पर सोने की कड़ियों वाली करधनी पहनाते हैं। उनकी वह कमर सिंह की सुन्दर कमर को भी जीत लेती है। वे बिना पलक झपकाए उन्हें निहारते हैं।
वे उन्हें लाल किनारी वाला वस्त्र पहनाते हैं। उनके वेश और आभूषणों की शोभा देखने के लिए सारा संसार लालायित है। नरहरि उनकी मनोहर शोभा को निहारता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 8