बिभाबित रति जबे क्रियापर हो'ये तबे
विभाव से जगी रति जब क्रिया में आती है, तब अनुभाव (बाद में उठने वाले भाव-लक्षण) प्रकट होता है। तब हृदय का प्रेम बाहर अनेक लक्षणों के रूप में दिखने लगता है।
ये लक्षण हैं: नाचना, ऊँचे स्वर से गाना, भूमि पर लोटना, शरीर को तानना, ज़ोर से पुकारना, जम्हाई लेना, तेज़ साँस लेना, दूसरे लोगों की उपस्थिति की परवाह न करना, लार बहना, बहुत ज़ोर से हँसना, सिर घुमाना, और डकार लेना।
शरीर और मन के बीस अलंकार भी होते हैं, जो भाव के आभूषण हैं। इनमें से उद्भास्वर नामक लक्षणों में केश-बन्ध खोलना, फूलों को सूँघना, और कटिबन्ध खोलना सम्मिलित हैं।
विलाप, आलाप, संलाप, प्रलाप, अनुलाप, अपलाप, सन्देश, अतिदेश, अपदेश, उपदेश, निर्देश और व्यपदेश, ये सब वाणी में प्रकट होने वाले अनुभाव के लक्षण हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
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