स्थायी भाबाबिष्ट चित्त पाइया बिभाब बित्त
जब स्थायी भाव हृदय में प्रवेश करता है, तो हृदय को विभाव का महान् धन प्राप्त होता है। यह असाधारण भाव प्राण-वायु को प्रभावित करता है, जिससे शरीर पर भाव के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
स्थायी भाव के आठ सात्त्विक लक्षण हैं: स्तब्ध होना, पसीना आना, रोमांच होना, स्वर का रुँधना, शरीर का काँपना, रंग बदलना, आँसू बहना और प्रलय (मूर्च्छा)। संचारी भावों में हर्ष, अमर्ष, भय, विषाद, विस्मय आदि आते हैं।
लीला की क्रिया, रस और समय के अनुसार ये भाव-लक्षण हर क्षण चार अवस्थाओं में प्रकट होते हैं: धूमायित, उज्ज्वलित, दीप्त और सुदीप्त।
जो साधक जिस स्तर का अधिकारी होता है, उसमें उसी अनुसार सात्त्विक भाव के लक्षण प्रकट होते हैं। सुदीप्त भाव के लक्षण तभी सहज ही स्पष्ट दिखाई देते हैं, जब महाभाव की अवस्था प्रकट होती है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
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