बिरले बसिया एकेश्वर
एकान्त स्थान में रहकर परम पुरुषोत्तम भगवान निरन्तर भगवान कृष्ण के पवित्र नामों का जप करते हैं।
वे सब अवतारों के शिरोमणि हैं। वे उन सब संन्यासियों के चिन्तामणि रत्न हैं जिनके लिए कृष्ण ही एकमात्र सम्पत्ति हैं।
उनके शरीर की सुगन्ध के सामने सुगन्धित चन्दन का लेप कुछ भी नहीं है।
स्वप्न में भी सबसे वैभवशाली रत्न-आभूषण उनके शरीर की शोभा तक नहीं पहुँच सकते।
उन्होंने देवी लक्ष्मी के साथ अपनी लीलाएँ त्याग दीं। अब वे वृक्ष के नीचे बैठते हैं।
उन्होंने अपनी बाँसुरी और वनमाला एक ओर रख दी। दण्ड थामे हुए अब वे संन्यासी हैं।
हँसी-विनोद की अपनी लीलाओं से मुँह मोड़कर अब वे रोते हैं, और उनकी आँखों के खिले हुए फूलों से आँसुओं की धारा बहती है।
अब शुद्ध दिव्य प्रेम का खजाना ही उनका एकमात्र धन है। अब वे निर्धन भक्तों के साथ रहते हैं, उन भक्तों के साथ जिनके लिए कृष्ण ही एकमात्र खजाना हैं।
अब वे दिव्य प्रेम के आँसुओं की भारी वर्षा करते हैं। वासु कहते हैं: मेरे प्राण अब टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बराड़ी राग
- पद
- 9