कि हेरिनु ओगो सइ बिदगध राज
आह! मैंने क्या देखा? नवद्वीप नगर में मैंने बुद्धिमानों के राजा को देखा। मैंने भक्तों के कल्पवृक्ष को देखा।
उस वृक्ष की शाखाएँ भक्ति की थीं, पत्ते दिव्य प्रेम के थे और फूल आनन्द के थे। उसने सारे जगत् को मोह लिया।
उसमें शुद्ध दिव्य प्रेम के फल लगे। वे फल उसमें हर क्षण लगते रहे। उन फलों से सदा नए-नए मधुर अमृत का अपार सागर बह निकला।
भक्त ही वे सारस, कोयल, तोते, भौंरे और हंस हैं जो सदा उस वृक्ष की महिमा गाते हैं।
देवता, मनुष्य और सारे चर-अचर प्राणी उस वृक्ष की छाया में रहते हैं और उसके फलों से पोषण पाते हैं। केवल वासुदेव दास अपने पिछले बुरे कर्मों के कारण उन फलों का स्वाद चखने से वंचित रह गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- सुहाई या देशाग राग
- पद
- 5