जगन्नाथ सुत महाप्रभु बिश्वम्भर
जगन्नाथ-सुत महाप्रभु बिश्वम्भर
गीतावली (भक्तिविनोद ठाकुर) से।
श्रीमन् महाप्रभुर शत नाम के चार गीतों में चैतन्य महाप्रभु के सौ नाम संकलित हैं। इसकी बनावट गीतावली में पहले आने वाले श्री कृष्णेर विंशोत्तर शत नाम जैसी है, पर यह सीधे कृष्ण के बजाय महाप्रभु को सम्बोधित है। इस तरह क्रम से अनेक नामों के पाठ की वही भक्ति-विधि महाप्रभु के अपने स्वरूप तक विस्तार पाती है। कृष्ण-नामों वाले खण्ड की तरह यह खण्ड भी महाप्रभु के परिवार और बचपन की पहचान से शुरू होता है। यह उन्हें जगन्नाथ मिश्र के पुत्र और उनके जन्म-नाम विश्वम्भर से पुकारता है, फिर अधिक सैद्धान्तिक उपाधियों की ओर बढ़ता है, जिनमें कलियुग को पवित्र करने वाले भी है। यह गौड़ीय वैष्णवों के उस केन्द्रीय विश्वास को दर्शाता है कि महाप्रभु का प्राकट्य और उनके द्वारा फैलाया गया सामूहिक कीर्तन विशेष रूप से इस युग के जीवों के उद्धार के लिए उपयुक्त हैं। इसका समापन केवल महाप्रभु के नाम पर नहीं, बल्कि उनके नाम के साथ अद्वैत प्रभु और नित्यानन्द प्रभु के नाम पर होता है। ये पंचतत्त्व के पाँच सदस्यों में से दो हैं, जिनकी गौड़ीय वैष्णव साधना में एक साथ पूजा होती है। यह दिखाता है कि परम्परा इन्हें एक-दूसरे से कितना अभिन्न मानती है, उस खण्ड में भी जो महाप्रभु के अपने सौ नामों पर बना है।
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