चैतन्य चन्द्रेर लीला समुद्र अपार
चैतन्यचंद्र की लीलाएँ एक अपार सागर हैं। उन्हें समझने की शक्ति किसी में नहीं, यही इस कथा का सार है।
मेरे श्रीकृष्ण वह तत्त्व हैं जिन तक शास्त्र भी नहीं पहुँच सकते। उनकी लीलाओं का अंत जानने की शक्ति किसमें है?
तो फिर मूर्ख लोग शास्त्रों का विचार करके, उनमें इसका अंत न पाकर, गौर-लीला को क्यों नहीं मानते?
अनंत का भी कोई अंत होता है, ऐसा कौन-सा शास्त्र कहता है? 'कृष्ण शास्त्र के अधीन हैं' यह सुनकर मुझे हँसी आती है।
कृष्ण अपनी ही इच्छा से गौर रूप में प्रकट हुए। अपने संपूर्ण वैकुंठ-धाम को साथ लेकर वे नवद्वीप में अवतरित हुए।
जब कृष्ण जीवों के उद्धार के लिए आते हैं, तब वे अपने सभी सहचरों के साथ पृथ्वी पर आते हैं।
गौर-अवतार में उनके श्री जय और विजय नवद्वीप में शत्रु-भाव से प्रकट हुए।
पूर्व अवतारों में वे असुर थे, अब वे शास्त्रों के पंडित बनकर जन्मे।
स्मृति और तर्क-शास्त्रों की दुहाई देकर वे शत्रु बनकर प्रकट हुए और गौरचंद्र से युद्ध करने में तत्पर हो गए।
इस प्रकार नवद्वीप के सभी निवासी क्षण-क्षण में श्री चैतन्य की लीला को और अधिक मधुर बनाते हैं।
जो अब ब्राह्मण-कुल में जन्मे चैतन्य के शत्रु हैं, उन्हें भी मैं चैतन्य की लीला को समृद्ध करने वाला ही मानता हूँ।
चाहे शत्रु हों या मित्र, श्री चैतन्य के सभी अनुचरों के श्रीचरणों में मैं नमन करता हूँ।
इस दास पर आप कृपा करें। भक्तिविनोद के मन को श्री चैतन्य के प्रति सुदृढ़ बना दें।