Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

छाडि' अन्य अभिलाष ज्ञान कर्म सहाबास

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छाडि' अन्य अभिलाष ज्ञान-कर्म-सहाबास आनुकूल्य कृष्णानुशीलन शुद्ध-भक्ति बोलि' तारे भक्ति-शास्त्र सु-बिचारे श्री-रूपेर सिद्धान्त-बचन
अर्थ

अन्य समस्त कामनाओं को, तथा ज्ञान और कर्म के संग को त्यागकर, भगवान् कृष्ण के अनुकूल जो साधना की जाती है, उसे ही शुद्ध भक्ति कहा जाता है। भक्ति-शास्त्रों का गहन अध्ययन करने के बाद श्रील रूप गोस्वामी ने यही सिद्धान्त प्रस्तुत किया है।

श्रबण कीर्तन स्मृति सेबार्चन दास्य नति सख्य आत्म-निबेदन होय साधन-भक्तिर अङ्ग साधकेर जाहे रङ्ग सदा साधु-जन-सङ्ग-मोय
अर्थ

श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवा, अर्चन, दास्य, वन्दन, सख्य और आत्म-निवेदन, ये सब साधन-भक्ति के अंग हैं, जिनमें साधक को आनन्द मिलता है। सदा साधुजनों की संगति में रहकर ही साधक इनका रसास्वादन करता है।

साधन-भक्तिर बले भाब-रूप भक्ति-फले ताहा पुनः प्रेम-रूप पाय प्रेमे जीब कृष्ण भजे कृष्ण-भक्ति-रसे माजे सेइ रस श्री-रूप शिखाय
अर्थ

साधन-भक्ति के बल से भाव-भक्ति का फल मिलता है, और वही भाव आगे प्रेम का रूप ले लेता है। प्रेम से जीव कृष्ण का भजन करता है और कृष्ण-भक्ति के रस में डूब जाता है। यही रस श्रील रूप गोस्वामी सिखाते हैं।