धन जन देह गेह कृष्णे समर्पण
“तुम अपना धन, अपने अनुयायी, अपने शरीर और अपना घर पहले ही भगवान कृष्ण के चरणों में अर्पित कर चुकी हो। कृपया अपने शुद्ध हृदयों में इसे याद रखो।
“तुम ‘हे मेरे पुत्र!’ कहकर विलाप क्यों करती हो? भगवान कृष्ण ने प्रसन्न होकर अपने भक्त को वापस ले लिया है।
जो कुछ भी होता है, वह सब भगवान कृष्ण की इच्छा से होता है। इस बात का अज्ञान ही यह धारणा बनाता है कि कुछ परिस्थितियाँ सुखद हैं और कुछ दुःखद।
कृपया जान लो कि भगवान कृष्ण जो कुछ भी चाहते हैं, वही अच्छा है। अपनी इच्छाओं को छोड़कर इस सारे शोक का अन्त कर दो।
कृष्ण देते हैं। कृष्ण ले लेते हैं। कृष्ण सबकी रक्षा करते हैं। कृष्ण बचाते हैं। कृष्ण मारते हैं। कृष्ण जो चाहते हैं, वही करते हैं।
जिस स्त्री की इच्छा कृष्ण की इच्छा के विरुद्ध जाती है, वह पाती है कि उसकी इच्छा पूरी नहीं होती। उसे केवल दुःख ही मिलता है।
बाकी सब कुछ छोड़कर बस भगवान कृष्ण का पवित्र नाम सुनो। तब तुम आनन्द से भर जाओगी और तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी होंगी।
श्रीवास के चरणों में भक्तिविनोद जीवन में और मृत्यु में भगवान कृष्ण के प्रति आत्म-समर्पण करने की शक्ति माँगते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
- 8