पतिब्रता लक्ष्मी देबी पति गता प्राण
अपने पति के प्रति समर्पित लक्ष्मीप्रिया देवी, जिन्होंने अपने प्राण अपने पति को समर्पित कर दिए हैं, प्रसन्नता से माता शची की सेवा करती हैं।
वे विग्रह को वस्त्र और अलंकार पहनाती हैं। वे घर की सफाई करती हैं। वे धूप जलाती हैं, दीप जलाती हैं, विग्रह के लिए भोग पकाती हैं, चन्दन का लेप और फूलों की मालाएँ तैयार करती हैं, और ऐसी ही बहुत-सी और सेवाएँ करती हैं।
शची विग्रह के कक्ष को अनेक प्रकार से कलात्मक ढंग से सजाती हैं। इस सेवा में लीन होकर वे स्वयं को भूल जाती हैं।
जब तक वे दोनों विग्रह की सेवा में लीन रहती हैं, तब तक शची और लक्ष्मीप्रिया शोक से टूटकर बिखरती नहीं हैं।
फिर भी भगवान् गौरांग के विरह में लक्ष्मीप्रिया का हृदय शोक से तड़पता है। उनकी अनुपस्थिति में उनके प्रति प्रेम लक्ष्मीप्रिया के शरीर को व्याकुल कर देता है।
उनकी अनुपस्थिति का दुःख अन्त में साँप का रूप लेकर प्रकट हुआ। उस साँप को देखकर लक्ष्मीप्रिया के हृदय में बड़ा आश्चर्य हुआ।
उस साँप ने लक्ष्मीप्रिया के चरण में डस लिया। तब लक्ष्मीप्रिया आध्यात्मिक जगत् को लौट गईं। ऐसा लोचन दास कहता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- लोचन दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- पद
- 7