गौर सुन्दर पहुं नदीया उदय करि
नदिया में उदित होकर, संसार को प्रेम के दान से भरकर और सबको भगवान कृष्ण के पवित्र नामों का दान देकर प्रभु गौरसुन्दर ने पापियों, पाषण्डियों, दीनों, पतितों, नीच जाति में जन्मे लोगों और अन्य सबका उद्धार किया।
प्रभु गौरांग के गुणों को सुनकर मेरे प्राण रो उठते हैं। लोगों को सत्य न जानते देखकर प्रभु गौरांग का हृदय अस्थिर हो गया और वे पुकारने लगे, “हरि का पवित्र नाम जपो!”
गदाधर को देखकर प्रभु गौरांग रोने लगे। डगमगाते कदमों से चलते हुए वे अपने हाथों से स्वरूप दामोदर और रामानन्द राय को पकड़ते हैं। “आह! मेरे प्रभु के सुन्दर चरण-चिह्न!” कहकर प्रभु गौरांग धूल में लोटने लगे। फिर नित्यानन्द प्रभु को गले लगाकर वे रोए।
अन्धे और बहरे तक सब प्रभु गौर के गुणों से मतवाले हो गए। सब दिशाओं में उन्हें छोड़कर कोई कुछ नहीं जानता था। बाँहें उठाकर “हरिबोल!” कहते हुए उन्होंने पतितों को गोद में भर लिया। प्रभु गौर ने संसार के लोगों को प्रेम के अमृत की बाढ़ में बहा दिया। उत्तम से अधम तक हर व्यक्ति को उन्होंने भगवान का महान भक्त बना दिया। केवल बलराम दास को उन्होंने नहीं बदला। केवल बलराम दास वंचित रह गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- बलराम दास
- पद
- 4