कोथाय आछिल गोरा एमन सुन्दर
कहाँ है कोई प्रभु गौर जैसा सुन्दर और तेजस्वी? उनके सुन्दर रूप ने सारे नदिया नगर को मोह लिया।
उनके चमकते केश सुन्दरता से बँधे हैं और रंगन, मालती, यूथी, पारुली, बकुल तथा और भी अनेक प्रकार के फूलों से सजे हैं।
मधु के लोभी कितने काले भौंरे उन फूलों के बीच उड़ते हैं? प्रभु गौर के उस रूप को देखकर वे अपने शरीर में प्राणों को शान्त नहीं रख पाते।
उनकी छाती पर मोतियों और मणियों का हार झिलमिलाता है। उनके हर अंग पर आभूषण बिजली की तरह चमकते हैं।
कुंकुम और चन्दन का लेप उनके अंगों पर लगा है। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं। उनके गले में वनमाला है।
वे धीरे-धीरे और सुन्दर ढंग से चलते हैं। वे इधर-उधर झूमते हैं। उनकी गर्दन इधर-उधर झूमती है। वे अमृत की बाढ़ हैं।
चलते समय उनकी पायलें मधुर स्वर में बजती हैं। बलराम दास कहते हैं: कृपया उनकी पूजा करो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- बलराम दास
- पद
- 7