Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

सहज इ काण्चन कान्ति कलेबर हेर इते जग जन मनो मोहनिया

सहज-इ काण्चन-कान्ति कलेबर हेर-इते जग-जन-मनो-मोहनिया ताहे कत कोटि मदन मूरछा-ओल अरुण-किरण-हर अम्बर बनिया
अर्थ

उनका स्वरूप स्वभाव से ही सोने की कान्ति जैसा तेजस्वी है। उन्हें देखकर संसार के लोगों का मन मोहित हो जाता है। वे कितने करोड़ कामदेवों को मोहित करते हैं? उनके तेजस्वी वस्त्र उगते सूर्य को भी जीत लेते हैं।

रा-इ प्रेम भरे गमन सु-मन्थर अन्तर गर गर पड-इ धरणीया स्वेद कम्प घन घन पुलकाबली घन हुहुङ्कार करत गरजनिया
अर्थ

उनका हृदय श्रीमती राधारानी के अनुभव किए हुए प्रेम से अभिभूत है। वे बहुत धीरे-धीरे चलते हैं। वे लड़खड़ाकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। वे काँपते हैं और पसीने से भीग जाते हैं। उनके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। वे ऊँचे स्वर में गरजते हैं।

डगमग देह थेह नाहि बान्ध-इ दुहु दिठि मेह सघने बरखणिया ओ रस भोर ओर नाहि पा-ओ-इ पतित कोरे धरि लोर सिचनिया
अर्थ

वे डगमगाते हुए चलते हैं। वे स्थिर नहीं रह पाते। दो मेघों की तरह उनकी आँखें आँसुओं की वर्षा बरसाती हैं। वे प्रेम के रस के सागर में डूब रहे हैं। वे तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच पाते। वे पतित पापियों को गले लगाते हैं। वे अपने आँसुओं से उन्हें सींचते हैं।

हरि हरि बलि रो-इ कत बिलप-इ आनन्दे उनमत दिबस रजनिया हरि हरि रब शुनि जगत तरिया गेल बण्चित बलराम दास पामरिया
अर्थ

वे कितनी बार “हरि! हरि!” पुकारकर रोते हैं? दिन-रात वे प्रेम के आनन्द में उन्मत्त रहते हैं। उन्हें “हरि! हरि!” जपते सुनकर सारा जगत् तर गया। केवल पतित बलराम दास तर नहीं पाया। केवल वही वंचित रह गया।

इस भजन के बारे में

रचयिता
बलराम दास
पद
4