सहज इ काण्चन कान्ति कलेबर हेर इते जग जन मनो मोहनिया
उनका स्वरूप स्वभाव से ही सोने की कान्ति जैसा तेजस्वी है। उन्हें देखकर संसार के लोगों का मन मोहित हो जाता है। वे कितने करोड़ कामदेवों को मोहित करते हैं? उनके तेजस्वी वस्त्र उगते सूर्य को भी जीत लेते हैं।
उनका हृदय श्रीमती राधारानी के अनुभव किए हुए प्रेम से अभिभूत है। वे बहुत धीरे-धीरे चलते हैं। वे लड़खड़ाकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। वे काँपते हैं और पसीने से भीग जाते हैं। उनके शरीर के रोम खड़े हो जाते हैं। वे ऊँचे स्वर में गरजते हैं।
वे डगमगाते हुए चलते हैं। वे स्थिर नहीं रह पाते। दो मेघों की तरह उनकी आँखें आँसुओं की वर्षा बरसाती हैं। वे प्रेम के रस के सागर में डूब रहे हैं। वे तैरकर किनारे तक नहीं पहुँच पाते। वे पतित पापियों को गले लगाते हैं। वे अपने आँसुओं से उन्हें सींचते हैं।
वे कितनी बार “हरि! हरि!” पुकारकर रोते हैं? दिन-रात वे प्रेम के आनन्द में उन्मत्त रहते हैं। उन्हें “हरि! हरि!” जपते सुनकर सारा जगत् तर गया। केवल पतित बलराम दास तर नहीं पाया। केवल वही वंचित रह गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- बलराम दास
- पद
- 4