Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

गोपी गण कुच कुङ्कुमे रञ्जित

गोपी-गण-कुच-कुङ्कुमे रञ्जित अरुण बसन शोभे अङ्गे काण्चन-कान्ति-बिनिन्दित-कलेबर रा-इ परष रस-रङ्गे
अर्थ

पहले उन पर गोपियों के वक्ष के कुंकुम से लाल चिह्न लगे रहते थे। अब केसरिया वस्त्र उनके अंगों को सुशोभित करता है। पहले वे श्रीमती राधारानी के मधुर स्पर्श से आनन्दित होते थे। अब उनका गौर शरीर सोने की शोभा को भी लज्जित करता है।

टेक
देख देख अपरूप गौर-बिलास लाख युबती रति यो गुरु लम्पट सो अब करल सन्न्यास
अर्थ

देखो, देखो, प्रभु गौर की अद्भुत लीला! जो महान लम्पट लाखों युवतियों से प्रेम करता था, उसने अब संन्यास स्वीकार कर लिया है।

यो ब्रज-बधू-गण दृढ-भुज-बन्धन अबिरत रहत आगोर सो तनु पुलके पूरित अâअ ढर ढर नयाने गलये प्रेम-लोर
अर्थ

पहले वे व्रज की गोपियों की भुजाओं में कसकर बँधे रहते थे। अब वे सदा भक्त के दिव्य प्रेम के आनन्द से अभिभूत रहते हैं। अब उनके शरीर के रोम प्रेम से खड़े हो जाते हैं। अब उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बहते हैं।

यो नट-बर घन-श्याम कलेबर बृन्दा-बिपिन-बिहारी कहये बलराम नट-बर सो अब अकिण्चन घरे घरे प्रेम-भिखारी
अर्थ

वे सुन्दर नर्तक थे, जिनका शरीर घने मेघ जैसा श्याम था, वे नर्तक जो वृन्दावन के वन में लीला करते थे। बलराम दास कहते हैं: नर्तकों में श्रेष्ठ वे अब अकिंचन संन्यासी बन गए हैं। अब वे घर-घर जाकर सबसे भिक्षा माँगते हैं कि लोग भगवान कृष्ण से प्रेम करने लगें।

इस भजन के बारे में

रचयिता
बलराम दास
पद
4