नबद्वीप गगने उयल दिन राति
नवद्वीप के आकाश में दिन-रात छाया हुआ एक मेघ चलने वाले और न चलने वाले प्राणियों पर अमृत की वर्षा करता है।
देखो, देखो! प्रभु गौर रूपी मेघ इस संसार में अवतरित हुआ है! वह बिना रुके प्रेम का अमृत बरसाता है।
अब पूरा संसार वर्षा से भर गया है। अब लोग भगवान कृष्ण की महिमा के अमृत में डूब गए हैं।
अब मतवाले मोर जैसे भक्त नाचते हैं। भिखारी जैसे अभक्त भी अमृत के जल में डूब गए हैं।
वर्षा से पोषित भक्ति की लता बहुत बड़ी होकर तीनों लोकों में फैल जाती है। उत्तम से अधम तक सब उस लता पर लगने वाले दिव्य प्रेम के फल को चखेंगे।
प्रभु गौर का मेघ कीर्तन का वज्र गिराता है, ऐसा वज्र जो नकली संन्यासियों पर गिरता है। गरजता हुआ वह मेघ एक और वज्र गिराता है, ऐसा वज्र जो निर्विशेषवादियों को टुकड़े-टुकड़े कर देता है।
एक और वज्र कर्म के साँप के हृदय को चीरकर दो टुकड़े कर देता है। फिर कलियुग के भ्रमित करने वाले मोह उस वर्षा की अमृत की उमड़ती लहरों में डूब जाते हैं।
भक्त रूपी प्यासे चातक पक्षी उस मेघ से गिरता अमृत पीकर सब तृप्त हो गए हैं। अब दसों दिशाओं में अमृत की नदियाँ उमड़ रही हैं।
पूरा संसार प्रेम के उमड़ते अमृत में डूब गया है। कहीं बचने का स्थान नहीं है। केवल बलराम दास बच गया है। जन्म और मृत्यु के बार-बार चलने वाले संसार के सूखे पर्वत शिखर पर खड़ा होकर वह उस बाढ़ से बच गया है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- बलराम दास
- पद
- 9