गोलोक छाडिय प्रभु केन बा अबनी
परमेश्वर ने गोलोक को क्यों छोड़ा? उन्होंने अपना श्याम रूप बदलकर गौर वर्ण का रूप क्यों धारण कर लिया?
हँसी और विनोद की अपनी लीलाओं को छोड़कर प्रभु अब रो क्यों रहे हैं? मैं नहीं जानता। भगवान गौर ने किसके लिए और क्यों अपना भावमय दिव्य प्रेम का जाल बिछाया?
एक क्षण वे “कृष्ण! कृष्ण!” पुकारकर रोते हैं। अगले ही क्षण वे “सखी! सखी!” पुकारते हैं।
एक क्षण वे “मथुरा! मथुरा!” पुकारते हैं। दूसरे क्षण वे “अक्रूर!” पुकारते हैं। वे व्याकुल हैं।
क्षण-क्षण वे पुकारते हैं, “अभागे चाँद! अभागे चन्दन!” वे धूल में लोटते हैं। अपने साथियों से घिरे हुए वे रोते हैं।
“जलकर राख हो जाने पर भी साध्वी गोपियाँ अपने प्राण नहीं छोड़तीं!” वे कहते हैं। व्याकुल होकर वे भूमि पर लोटते हैं।
गदाधर रोते हैं। वे अपने प्राणनाथ को गले लगाते हैं। रामानन्द राय रोते हैं। भावमय दिव्य प्रेम के झकोरों से वे इधर-उधर डोलते हैं।
स्वरूप दामोदर और रूप गोस्वामी भी रोते हैं। इन लीलाओं का स्मरण करते हुए, पर उनमें से कुछ भी न समझते हुए, नयनानन्द दास भी रोते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नयनानन्द दास
- पद
- 8