आ ओत पिरीति मूरति मय सागर
एक अद्भुत प्रभु आए हैं, जो साक्षात् दिव्य प्रेम के सागर हैं और ब्राह्मणों के राजा हैं। उनके भक्त साथी नई-नई महिमा से भरे हैं। वे जिस दिव्य प्रेम-रस का आस्वादन करते हैं, वह सदा नया-नया होता है। उनका रूप नए-नए बहुमूल्य रत्नों के भण्डार के समान है।
नदिया में लीला करने वाले प्रभु की जय हो, जय हो! वे अपने साथ वृन्दावन और सभी वैकुण्ठ लोकों की महिमा लाते हैं। वे अपने साथ सब प्रकार के सुखों में से सर्वश्रेष्ठ सुख लाते हैं।
उनकी जय हो, जय हो, महान जय हो! अब दिव्य प्रेम की उमड़ती हुई स्वर्गीय अमृत-गंगा आनन्द से बह रही है। वे उस अमृत-नदी से कितनी बार जल पीते हैं, उसमें स्नान करते हैं और उसमें डुबकी लगाते हैं? वे अपने साथियों को कितनी बार गले लगाते हैं?
वे हर घर में, फूलों से भरे हर बगीचे में और हर वृक्ष के नीचे लीला करते हैं। नयनानन्द कहते हैं, भावमय दिव्य प्रेम का दान देकर भगवान विश्वम्भर हर व्यक्ति की इच्छाएँ पूर्ण करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नयनानन्द दास
- पद
- 4