किना से सुखेर सरोबरे
क्या यह आध्यात्मिक आनन्द का सरोवर नहीं है, ऐसा सरोवर जिसमें भावमय प्रेम की तरंगें उठती और गिरती हैं?
भगवान विश्वम्भर नाचते हैं। प्रेम के आवेग में उनके चरणों के स्पर्श से पृथ्वी शान्त नहीं रह पाती।
भगवान विश्वम्भर सुनहरे चन्द्रमा के समान हैं। वे अमृत की कितनी धाराएँ बरसाते हैं? वे शान्त नहीं रह पाते।
उनके कुछ प्रिय साथी हंस हैं। कुछ भौंरे हैं। कुछ चकोर पक्षी हैं।
भावमय दिव्य प्रेम से विभोर होकर नदिया के लोग नाचते हैं। नृत्य की नई से नई लहरें एक के बाद एक उठती चली जाती हैं।
अब तो दीन-हीन और पतित लोग भी भक्ति के नए-नए रत्न सहज ही बटोर लेते हैं।
नयनानन्द कहते हैं, परम आनन्दमय आध्यात्मिक धाम वृन्दावन अब नदिया के नगरों में विद्यमान है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नयनानन्द दास
- पद
- 7