मुख खानि पुर्णिमार शशी किबा मन्त्र जपे
उनके मुख का पूर्ण चन्द्र महामन्त्र का जप करता है। उनके अधर, जो बिम्ब फलों की हँसी उड़ाते हैं, सदा क्यों काँपते रहते हैं?
भगवान गौर मनोहर ढंग से नाचते हैं। वे हर जीव के हृदय में भावमय दिव्य प्रेम का उपहार रख देते हैं।
भगवान गौर के मुख-चन्द्र को रोते हुए देखकर हर व्यक्ति की आँखें वर्षा ऋतु के उन बादलों जैसी हो गई हैं, जो आँसुओं की वर्षा कर रहे हैं।
नए अमृत-रस से मधुर भगवान गौर नए सोने को भी मात देते हैं। उनकी छाती पर भावमय प्रेम के आँसुओं की बाढ़ बहती है।
नयनानन्द कहते हैं, क्या मैं हर्षित हृदय से भगवान गौर को फिर गदाधर के पास देख पाऊँगा?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नयनानन्द दास
- पद
- 5