गोरा हेम जलद अबतार
भगवान गौर आँसुओं की मूसलाधार वर्षा करते हुए सोने के बादल जैसे हैं।
उनके गुण वर्षा-ऋतु की झड़ी हैं। उनकी वाणी की गर्जना से दिशाएँ काँप उठती हैं।
उनकी कृपा की बिजली दिन-रात चमकती है। दिन-रात वे दिव्य प्रेम की वर्षा करते हैं।
वे पृथ्वी की सतह को आनन्द के कीचड़ से भर देते हैं। उस कीचड़ से ऐसे वृक्ष उगते हैं जिन पर दिव्य प्रेम के अनेक प्रकार के फल लगते हैं।
हर फल नए-नए अमृत से मधुर है। जो प्रेम वे फल धारण करते हैं, उसका वर्णन करने की शक्ति किसमें है?
उनके नाम, गुण और कर्म सब चिन्तामणि रत्न हैं। आश्चर्य से भरी वाणी में वासु ये शब्द कहते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- श्री क्षणदा-गीत-चिन्तामणि
- राग
- सुहाई राग या गान्धार राग
- पद
- 6