जय जय कल रब नदीया नगरे
जय जय कल-रब नदीया नगरे
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन (नरहरि दास) से।
वासुदेव घोष अपने भाइयों गोविन्द और माधव के साथ, कटवा के पास अजय नदी के किनारे कुलाई गाँव के तीन भाइयों में से एक थे, जो प्रसिद्ध कीर्तन-गायक और चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु के नित्य पार्षद बने। जगन्नाथ पुरी के जिस रथयात्रा उत्सव में स्वयं महाप्रभु आए थे, वहाँ की सात कीर्तन-मण्डलियों में से एक का नेतृत्व इन तीनों भाइयों ने मिलकर किया था। यहाँ वासुदेव की अपनी छाप वाले तीस भजन हैं, जो इस पूरे संग्रह का सबसे बड़ा एक-कवि अध्याय है। इनमें नवद्वीप में चैतन्य के प्राकट्य का गौर-चन्द्रिका वर्णन है, और साथ में कई भजन सीधे नित्यानन्द प्रभु की महिमा गाते हैं, उन्हें पतितों का आश्रय बताते हुए। इसमें इन भाइयों का नित्यानन्द के साथ विशेष रूप से निकट ऐतिहासिक सम्बन्ध झलकता है।
30 भजन
जय जय कल-रब नदीया नगरे
नदीया आकाशे आसि उदिल गौराङ्ग-शशी
मिश्र पुरन्दर किछु मने बिचारिया
एक-मुखे कि कहिब गोराचाँदेर लीला
मायेर अङ्गुलि धरि शिशु गौर-हरि
पूर्णिमा रजनी चाँद गगने उदय
भालिरे नाचेरे मोर शचीर दुलाल
गोरा नाचे शचीर दुलालिया
किये हम पेखलुँ कनक पुतलिया
शचीर आङ्गिनाय नाचे विश्वम्भर राय
गोरा-गुण गा-ओ शुनि
गोरा हेम-जलद-अबतार
आहा मरि गोरा-रूपेर कि दिब तुलना
गौराङ्ग बिहर-इ परम आनन्दे
सङ्कीर्तने नित्यानन्द नाचे
निता-इ केबल पतित जनार बन्धु
निता-इ आमार परम दयाल
जय जय ध्वनि उठे नदीया नगरे
गोरा अभिषेक कथा अद्भुत कथन
तैल हरिद्रा आर कुङ्कुम कस्तूरी
आरे मोर आरे मोर गोरा द्विज-मणि
कि कहिब शत शत तुया अबतार
बिरले बसिया एकेश्वरे
जय जय जगन्नाथ शचीर नन्दन्
बिरले बसिया एकेश्वर
कि हेरिनु ओगो स-इ बिदगध-राज
जाम्बूनद-चय रुचिर गञ्जन
रस-परिपाटी नट कीर्तन लम्पट
अरुण बसने बिबिध भूषणे
अबतार कैल बड़ बड़