गोवर्धन गिरिवर केवल निर्जन स्थल
गोवर्धन पर्वत के एक एकांत स्थान में राधा-कृष्ण विश्राम करेंगे। ललिता-विशाखा के साथ, मैं कब आनंदपूर्वक उनके सुखद, अरुण चरणों की सेवा कर सकूँगा?
सोने की डिबिया में कपूर और तांबूल भरकर, कब मैं उनके मुखकमल में रखूँगा? रत्नजड़ित करधनी और पायल लाकर, कब मैं उनके दोनों चरणों में पहनाऊँगा?
कब मैं सोने का कटोरा सुगन्धित चंदन से भरकर राधा-कृष्ण के दिव्य अंगों पर लगाऊँगा? कब, जब गुरु-रूपा सखी मेरी बाईं ओर होंगी, मैं युगल के त्रिभंगी रूप पर चामर से हवा करूँगा?
उनके कमल-नेत्रों को देखकर कब मेरा रोम-रोम पुलकित होगा? कब मैं अपने हाथों से उन दोनों के चरणों को छूऊँगा? चैतन्य के दासों के दास नरोत्तम दास के मन में सदा केवल यही एक अभिलाषा जगती रहती है।