हरि हरि! आर कि एमन दशा हब
हे हरि! हे हरि! क्या मुझे कभी ऐसी दशा प्राप्त होगी, जब मैं महाराज वृषभानु के नगर में, गोप-गोपियों के घर में, एक कन्या के रूप में जन्म लूँगी?
कब जावट में मेरा विवाह होगा, और कब मैं वहाँ निवास करूँगी? सखियों में जो सबसे श्रेष्ठ हैं और उनकी सबसे प्यारी हैं, कब मैं उनके चरणों की सेवा करूँगी?
जब वे कृपा करके मुझे अरुण चरणों तक ले जाकर वहीं समर्पित कर देंगी, तब युगल के चरणों की सेवा करके मेरी यह दशा सफल होगी और मन की आशा पूरी होगी।
वृन्दावन में दिव्य युगल चारों ओर सखियों से घिरे हैं, कब मैं उनकी सेवा करूँगी? चारों ओर सखियाँ हाथों में तरह-तरह की सामग्री लिए होंगी, और मैं मन भरकर यह सब देखूँगी।
उनके दोनों चंद्रमुखों को देखकर मेरी संतप्त आँखें शीतल होंगी, और नेत्रों से अश्रुधारा बहेगी। वृन्दा देवी से आदेश पाकर मैं उनके समीप जाऊँगी। वह दिन कब मेरा होगा?
मुझे असहाय और अनाथ देखकर श्री रूप-मंजरी कब मुझे अपने दोनों अरुण चरणों में रख लेंगी? नरोत्तम दास कहते हैं, प्रिय नर्म-सखियाँ कब मुझे अपनी दासी बनाएँगी?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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