हा हा कबे गौर निताइ
हाय हाय, गौर-निताई ये दो भाई कब इस पतित जन पर महान कृपा करके अपना दर्शन देंगे?
उन दोनों की कृपा से नवद्वीप-धाम में कब मैं व्रज की शोभा देखूँगा? आनंद-सुखद कुंज की मनोहर छवि देखकर कब मेरी आँखों की चाह पूरी होगी?
उसके निकट श्री ललिता-कुंड है, जिसके चारों ओर सैकड़ों रत्न-जटित वेदियाँ हैं, जहाँ राधा-कृष्ण निरंतर अपनी लीलाओं का विस्तार करते हुए विहार करते हैं।
जहाँ सखियाँ लीला में सहायक होकर विविध सेवाओं का सुख पाती हैं, वहाँ यह दासी सखियों की आज्ञा से इधर-उधर कार्यों में दौड़ती रहेगी।
मालती के फूलों की माला गूँथकर मैं लाऊँगी, फिर उसे किसी सखी के हाथ में दे दूँगी। जब वह सखी उस माला को राधा-कृष्ण के गले में पहनाएगी, तब मैं आनंद से भरकर नृत्य करूँगी।