हरि हरि ! आर कबे पालटिबे दशा
हे हरि! हे हरि! मेरी यह दशा कब बदलेगी, जब मैं यह सब त्यागकर वृन्दावन धाम को जाऊँगा? मन में यही आशा लिए बैठा हूँ।
धन, अनुयायी, संतान और पत्नी, इन सबको दूर छोड़कर, कब मैं एकाग्र मन से वृन्दावन जाऊँगा? कब मैं सारे दुःख छोड़कर वृन्दावन में रहूँगा, और मधुकरी भिक्षा माँगकर खाऊँगा?
यमुना का जल अमृत के समान है, कब मैं उसे भर पेट पिऊँगा? कब आनंद से राधा-कुंड के जल में स्नान करूँगा, और श्याम-कुंड पर सदा के लिए पड़ा रहूँगा?
कब मैं बारह वनों में, जहाँ-जहाँ रस-लीला हुई थी, घूमूँगा और प्रेम में विभोर होकर धरती पर लोटूँगा? कब मैं एक-एक व्रजवासी के चरण पकड़कर उनसे लीला-स्थलों के बारे में पूछूँगा?
वृन्दावन के भजन-स्थल और जितने भी उपवन हैं, वे कब मेरी आँखों के सामने आएँगे? नरोत्तम दास का मन दिव्य युगल के चरणों की आशा रखता है।