हरि हरि! आर कि एमन दशा हब (ए भव संसार त्यजि)
हे हरि! हे हरि! क्या मुझे कभी ऐसी दशा मिलेगी? कब मैं यह भव-संसार छोड़कर, परम आनन्द में डूबकर व्रजभूमि जाऊँगा?
कब मुझे सुखमय वृन्दावन के दर्शन होंगे? कब मैं वहाँ की धूल अपने शरीर पर मलूँगा? कब प्रेम से गद्गद होकर, राधा-कृष्ण का नाम लेते हुए, ऊँचे स्वर में रोता हुआ घूमूँगा?
कब मैं किसी एकान्त कुंज में जाकर साष्टांग प्रणाम करूँगा और "हा राधानाथ!" कहकर पुकारूँगा? कब यमुना के तट पर उसके जल को छूऊँगा और अंजलि में भरकर पिऊँगा?
कब मेरी ऐसी दशा होगी कि मैं श्रीरास-मण्डल जाऊँ और वहाँ की धूल में लोटूँ? कब वंशीवट की छाया पाकर, परम आनन्द से भरकर, उसी छाया में पड़ा रहूँगा?
कब मैं गोवर्धन पर्वत को जी भरकर देखूँगा? कब राधाकुण्ड पर मेरा वास होगा? कब घूमते-घूमते यह देह गिर जाएगी? दीन नरोत्तम दास यही कहता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- प्रार्थना
- भाव
- पद
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