जौवने जखोन, धन उपार्जने
युवावस्था में जब मैं धन कमाने में लगा, तो मुझमें धन की तीव्र लालसा जाग उठी। तब धर्म का स्मरण करके मैंने एक पत्नी का हाथ थाम लिया।
उसके साथ गृहस्थी बसाकर मैंने बहुत सा समय व्यर्थ खो दिया। हमारे कई पुत्र-पुत्रियाँ हुईं, और मेरा हृदय भीतर से टूटता चला गया।
गृहस्थी का भार दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया, और जीवन के लक्ष्य की ओर मेरी प्रगति रुक गई। बुढ़ापे ने आकर मुझे घेर लिया, और मेरा मन अस्थिर हो उठा।
रोग से बेचैन, चिन्ता से ज्वरग्रस्त, मेरा हृदय अभावों में जल रहा है। इस अन्धकार से निकलने का कोई उपाय मुझे नहीं दिखता, और अब मैं भयभीत हो गया हूँ।
संसार-रूपी नदी की धारा का कोई अन्त नहीं है, और मृत्यु सदा भयंकर रूप में निकट खड़ी है। मैंने सोचा था, 'यह सब पूरा करके फिर आपकी सेवा करूँगा', परन्तु मेरी यह आशा भी व्यर्थ सिद्ध हुई।
भक्तिविनोद कहते हैं: 'अब सुनिए, प्रभु! मैं सर्वथा असहाय हूँ। आपकी कृपा के बिना सब कुछ निराशा ही है। मुझे अपने चरणों की शरण दे दीजिए।'
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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- 6