प्रभु हे! शुनो मोर् दुःखेर् काहिनी
हे प्रभु! मेरी व्यथा की कहानी सुनिए। मैंने विषय के भयानक विष को अमृत समझकर पी लिया, और अब मेरे जीवन का सूर्य अस्त होने को है।
बचपन खेल-कूद के आनंद में और किशोरावस्था पढ़ाई में बीत गई, फिर भी मेरा विवेक कभी नहीं जगा। यौवन में भोग-विलास के वश होकर मैंने घर बसाया, और मेरे बाल-बच्चे और मित्र बढ़ते गए।
फिर बुढ़ापा आया और सारा सुख भाग गया। रोग के वश होकर मैं व्याकुल हो गया। मेरी सारी इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो गईं और शरीर क्षीण हो गया। भोग न मिलने से मेरा हृदय दुखी हो गया।
अब मुझमें ज्ञान का कण भी नहीं बचा, और भक्ति के रस से भी मैं वंचित हूँ। अब मेरे उद्धार का उपाय क्या होगा? आप पतितों के मित्र हैं, और मैं पतितों में सबसे नीच हूँ, कृपा करके मुझे अपने चरणों में उठा लीजिए।
यदि आप मेरा न्याय करने आएँगे, तो मुझमें कोई गुण नहीं मिलेगा। इसलिए कृपा करें, न्याय को छोड़ दें, और अपने चरण-कमलों का अमृत मुझे पिलाएँ। इस भक्तिविनोद का उद्धार कीजिए।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- शरणागति
- भाव
- पद
- 5