जोग पीठोपरि स्थित अष्ट सखी सुबेष्टित
वृन्दावन के कदम्बवन में योगपीठ पर आठ सखियों से घिरे, राधा के साथ बांसुरी धारण करने वाले, सारे जगत के हृदय को मोहित करने वाले श्रीकृष्ण के चरणों में मेरे प्राण समर्पित हैं।
सखियों की आज्ञा के अनुसार मैं युगल की सेवा करती हूँ। उनकी पाल्यदासी बनकर मैं सदा युगल के चरणों का ही ध्यान करती हूँ।
कभी कृपा करके वे मेरा हाथ पकड़ लेते हैं और मधुर वचन बोलते हैं। वे दोनों मेरे चढ़ाए हुए पान को प्रसन्नता से खाते हैं और बड़े हर्ष से मेरी माला ग्रहण करते हैं।
कभी-कभी वे किसी बहाने से ओझल हो जाते हैं। उन्हें न देख पाकर मैं जल उठती हूँ।
वे दोनों जहाँ कहीं भी रहें, मैं तो उनके चरणों की दासी ही हूँ। उनके मिलन का आनन्द और वियोग की पीड़ा, दोनों को मैं समान भाव से स्वीकार करती हूँ।
राधा-कृष्ण ही मेरे प्राण हैं, जीवन में भी और मृत्यु में भी। वे मुझे रखें या मार डालें, मैं यही प्रार्थना करती हूँ कि वे दोनों सदा सुखी रहें।
भक्तिविनोद उन दोनों के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानते। अपनी सखी के चरणों में गिरकर वे सदा राधा के समूह में रहकर युगल-चरणों की ही कामना करते हैं।