कबे आहा गौराङ्ग बोलिया
'गौरांग!' कहकर पुकारते हुए, कब मैं भोजन और शयन की देह-चिंता से विरक्त होकर उसे त्याग दूँगा?
अभिमान त्यागकर कब मैं नवद्वीप-धाम में गाँव-गाँव घूमूँगा? धामवासियों के घर से माधुकरी भिक्षा लेकर कब पेट भर खाऊँगा?
नदी के तट पर जाकर अंजलि भर-भर कब प्रभु के चरणों का जल पीऊँगा? किसी वृक्ष के नीचे लेटकर कब आलस्य त्यागकर शरीर में बल पाऊँगा?
रुँधे गले से 'गौर-गदाधर!' और 'श्री राधा-माधव!' के नाम पुकारते हुए, रोते-रोते ऊँचे स्वर में कब मैं समस्त धाम में विचरण करूँगा?
किसी वैष्णव को देखकर, उन्हें हृदय का सच्चा बंधु जानकर, मैं उनके चरणों में गिर पड़ूँगा। तब वह वैष्णव ठाकुर मुझे अपना दास मानकर प्रभु का कीर्तन सिखाएँगे।