कबे मोर मूढ मन छारि' अन्य ध्यान
मेरा यह मूढ़ मन कब अन्य सब चिंतन त्यागकर श्रीकृष्ण के चरणों में विश्राम का स्थान पाएगा?
कब मैं यह जानूँगा कि मेरे पास अपना कुछ भी नहीं है, और मुझसे तुच्छ इस संसार में कोई और नहीं है?
कब मैं चाण्डाल तक सभी को प्रणाम करूँगा, और विनती करते हुए उनसे कृष्ण-भक्ति की भिक्षा माँगूँगा?
कितने दिनों बाद मेरे मन में सब जीवों के लिए दया जागेगी? जीवों की दुर्गति देखकर कब मेरी आँखों से आँसू बहेंगे?
रोते-रोते मैं कब वृन्दावन जाऊँगा? कब व्रज-धाम में वैष्णवों की शरण लूँगा?
व्रजवासियों के समीप दोनों हाथ जोड़कर, अत्यंत आग्रह से, कब मैं लीला-स्थलों के विषय में पूछूँगा?
कब मैं कहूँगा, 'हे व्रजवासियों, मुझ पर कृपा करके दिखाओ कि हरि ने यहाँ कहाँ-कहाँ लीला की थी'?
फिर कब कोई कृपालु व्रजवासी मुझे साथ लेकर वन में ले जाएगा?
वह कहेगा, 'देखो, यह वही कदंब वन है, जहाँ व्रजेन्द्र-नन्दन ने रास-लीला की थी...'
'...यह देखो, नन्द-ग्राम है, यह नन्द का घर है। यह देखो, यहाँ बलदेव ने रास किया था...'
'...यह देखो, यहीं वस्त्र-हरण हुआ था, और यहीं बकासुर का वध हुआ था।'
इस प्रकार उस व्रजवासी के साथ वृन्दावन में कब मैं प्यासी आँखों से लीला-स्थलों को देखूँगा?
कब यमुना के तट पर बाँसुरी की ध्वनि सुनकर मैं आनन्द से बेसुध होकर धरती पर गिर पड़ूँगा?
कब कोई दयामय व्रजवासी 'कृष्ण! कृष्ण!' कहते हुए अपनी अंजलि भर जल मुझे पिलाएगा?
हरि-नाम सुनकर पुनः चेतना पाकर, कब मैं उस व्रजवासी के साथ फिर विचरण करूँगा?
कब मेरा ऐसा शुभ दिन आएगा, जब मैं द्वार-द्वार जाकर माधुकरी भिक्षा माँगूँगा?
यमुना का जल अंजलि भरकर कब पीऊँगा? रात्रि में किसी मंदिर के द्वार पर कब सोया रहूँगा?
जब इस भौतिक शरीर का अंत आएगा, और यह जल के जीवों के लिए बड़ा भोज बन जाएगा,...
...तब कब मैं अपनी सिद्ध-देह में, अपने कुंज में सखी के चरणों के पास सदा रहकर कृष्ण-धन की सेवा करूँगा?
यह पापी, यह राख का ढेर, यही प्रार्थना करता है: 'हे श्री जाह्नवा देवी, इस बार मुझ पर कृपा कीजिए।'