कबे मोर सेइ दिन् ह’बे
हे गुरुदेव! कब वह दिन मेरा होगा, जब मैं मन को स्थिर करके, किसी एकांत स्थान में बैठकर कृष्ण का नाम गाऊँगा? तब संसार का कोलाहल मेरे कानों में प्रवेश नहीं करेगा, और देहात्मबुद्धि का रोग मुझसे दूर रहेगा।
निरंतर गाते-गाते मैं 'हरे कृष्ण' पुकारूँगा, मेरे नेत्रों से अश्रु बहेंगे, मेरे शरीर में रोमांच होगा, और मैं प्रेम से अभिभूत हो जाऊँगा।
मेरे मुख से गद्गद वाणी निकलेगी, मेरा शरीर काँपेगा, बार-बार स्वेद से भीगेगा, विवर्ण होगा, और प्रलय के समान स्तंभित हो जाएगा।
निष्कपट भाव से यह दशा मुझे कब प्राप्त होगी? तब मैं निरंतर नाम गाऊँगा। भाव में डूबा रहकर, किसी तरह देह का निर्वाह करते हुए, मैं आपकी कृपा पाऊँगा।